- यह लेख आदिवासियों में मृत्यु के बाद पारिवारिक सदस्यों का मुंडन क्यों किया जाता है इसके पीछे क्या तर्क है इस पर यह लेख सादर प्रस्तुत है इससे पहले भी इस विषय पर मै यह लेख लिख चूका था परन्तु वर्तमान में ढूंढने पर वह लेख मुझे प्राप्त नही हुआ वा यह प्रश्न ग्रुप के माध्यम से पुनः पूछा गया इस लिए इसे दोबारा लिख रहा हूँ जैसा की आप सभी को पता ही है हमारे पूर्वज न तो (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); ज्यादा पढ़े लिखे थे और न ही इन्हें शिक्षा का अधिकार ही दिया गया था परन्तु यह जो विषय है उससे भी पहले का है जब भारतीय सभ्यताओ का विकास हुआ व आदिमानव पूरी तरह विकसित हो चुके थे व लोहे के औजारों का प्रयोग करना शुरू कर चुके थे बात तब की है अर्थात वैदिक यूग के पूर्व जब आदिमानव (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); में सभ्यता पूर्ण रूप से विकसित हो चुका था और आदिमानव कबीलों और छोटे छोटे संगठनों में रहकर शिकार वा जीवन के महत्वपूर्ण क्रियाकलाप मिलजुलकर कबीलों के माध्यम से करते थे, उनके कबीलों के नियम शक्त वा सभी सदस्यों के द्वारा उन नियमो का पालन भली भांति से किया जाता था (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); व प्रत्येक काबिले का एक सरदार हुआ करता था जो कबीलों के हितो को धयान में रखकर काबिले के कल्याण हेतु नियम वा फैसले करता था और काबिले के सरदार का चुनाव भी कम आश्चर्य जनक नही होता था, काबिले के सरदार का चुनाव भी कई पैमानों को ध्यान में रखकर बुजुर्गो और काबिले के सदस्यों द्वारा तय किया जाता था, और कभी कभी यह स्थिति भी बन पड़ती थी की एक काबिले का टकराव दुसरे काबिले के साथ हो जाती थी, (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); उस समय अपने वजूद को बचाए रखने के लिए खानों के लिए मुख्यतः शिकार और जंगली फल फुल कंद मूल पर ही निर्भर थे और टकराव भी इन्ही चीजो के लिए होता थ (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); ा कभी कभी शिकार करते करते जंगली जानवरों द्वारा हमला कर देने से किसी सदस्य की मृत्यु हो जाति थी जिसका शोक मनाने के लिए काबिले के द्वारा उनके चीजो को एक जगह इक्कठे कर अपने शक्ति अनुसार कुछ चीजे अर्पित करते थे वा उस मृत्तात्मा को अंतिम भेट वा सम्मान देते थे, शोक प्रकट करते थे जैसे कोई अपने पास रखी बर्झी समर्पित कर डेटा था तो कोई फल या कोई फुल या कोई अपने पास रखी कोई भी चीज उस मृत शरीर व्यक्ति के पास रख देते थे उसी क्रम में अगर किसी के पास कुछ नही होता था तो अपना बाल ही अर्पित कर देते थे क्योकि सभ्यता और सामाजिक जीवन के शुरुवाती में इतने सुख सुविधा की चीजे नही थी जो वर्तमान में हमारे पास है इसलिए अपने से जो बन पड़ता था वह समर्पित करते थे धीरे धीरे समय के साथ साथ अर्पित करने की प्रथा बन गई व बाल समर्पित केवल उनके पुत्रो भाइयो या नजदीकी सम्बन्धी ही कर सकते है यह नियम कबीलों में लागू होता गया, (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); यह नियम भी कई कबीलों में भिन्न भिन्न रूपों परिवर्तित होता गया और यही परम्परा आदिवासियों में भी विकसित हो गया की मृत्यु के पश्चात अपने पूर्वज(जिनकी मृत्यु हो गई है) उनको अंतिम सम्मान हेतु भेट स्वरुप अपना बाल समर्पित किया जाता है वर्तमान में भी यह नियम आदिवासी समुदाय में लागू है मै यह बात स्पष्ट करना चाहूँगा की यह परम्परा वैदिक युग के पहले से शुरू हुआ जो वैदिक युग में खूब खिला (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); बड़ा व इसे वैदिक यूग में कई धर्मो में भिन्न भिन्न रूपों में वर्णन किया गया परन्तु यह किसी धर्म से सम्बंधित नही था, वर्तमान में भी इसके स्वरुप में कई भिन्नता परिलक्षित होती है जैसे बाल के साथ मुंच्छ भी बनाने की परम्परा विकसित हो गई, जिनका मृत्यु हुआ है (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); उनका कोई बड़ा लड़का है वही अपने पिता को बाल दे सकता है. चोटी रखने की परम्परा , मठ बनाने की परम्परा, आदि वर्तमान में प्रचलित है ,, जैसा की लेख से ही पता चल गया होगा की मुंडन करने की परम्परा बहुत पुरानी है,,,,,,,वर्तमान में कई लोग इसको विभिन्न धर्मो के अंतर्गत देखते है जो की गलत है,,, कई बार कई परम्परा या लोक व्यवहार में समानता के चलते हम सभी चीजो को एक ही मान के चलते है (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); जो की सही नही है आपका विचार मेरे विचार से मिले जरुरी नही है,,,,,अगर आप धार्मिक रूप से मुंडन करवाते होंगे शायद पूर्वज की आत्मा के शांति के लिए कह नही सकते
- बार बार के मुड़ते भेड़ बैकुंठ न जाय
प्रिय पाठकों
जय जोहार जय माँ
दंतेश्वरी
यह लेख आदिवासियों में मृत्यु के बाद पारिवारिक सदस्यों का मुंडन क्यों किया जाता है इसके पीछे क्या तर्क है इस पर यह लेख सादर प्रस्तुत है इससे पहले भी इस विषय पर मै यह लेख लिख चूका था परन्तु वर्तमान में ढूंढने पर वह लेख मुझे प्राप्त नही हुआ वा यह प्रश्न ग्रुप के माध्यम से पुनः पूछा गया इस लिए इसे दोबारा लिख रहा हूँ जैसा की आप सभी को पता ही है हमारे पूर्वज न तो ज्यादा पढ़े लिखे थे और न ही इन्हें शिक्षा का अधिकार ही दिया गया था परन्तु यह जो विषय है उससे भी पहले का है जब भारतीय सभ्यताओ का विकास हुआ व आदिमानव पूरी तरह विकसित हो चुके थे व लोहे के औजारों का प्रयोग करना शुरू कर चुके थे बात तब की है अर्थात वैदिक यूग के पूर्व जब आदिमानव में सभ्यता पूर्ण रूप से विकसित हो चुका था और आदिमानव कबीलों और छोटे छोटे संगठनों में रहकर शिकार वा जीवन के महत्वपूर्ण क्रियाकलाप मिलजुलकर कबीलों के माध्यम से करते थे, उनके कबीलों के नियम शक्त वा सभी सदस्यों के द्वारा उन नियमो का पालन भली भांति से किया जाता था व प्रत्येक काबिले का एक सरदार हुआ करता था जो कबीलों के हितो को धयान में रखकर काबिले के कल्याण हेतु नियम वा फैसले करता था और काबिले के सरदार का चुनाव भी कम आश्चर्य जनक नही होता था, काबिले के सरदार का चुनाव भी कई पैमानों को ध्यान में रखकर बुजुर्गो और काबिले के सदस्यों द्वारा तय किया जाता था, और कभी कभी यह स्थिति भी बन पड़ती थी की एक काबिले का टकराव दुसरे काबिले के साथ हो जाती थी, उस समय अपने वजूद को बचाए रखने के लिए खानों के लिए मुख्यतः शिकार और जंगली फल फुल कंद मूल पर ही निर्भर थे और टकराव भी इन्ही चीजो के लिए होता थ ा कभी कभी शिकार करते करते जंगली जानवरों द्वारा हमला कर देने से किसी सदस्य की मृत्यु हो जाति थी जिसका शोक मनाने के लिए काबिले के द्वारा उनके चीजो को एक जगह इक्कठे कर अपने शक्ति अनुसार कुछ चीजे अर्पित करते थे वा उस मृत्तात्मा को अंतिम भेट वा सम्मान देते थे, शोक प्रकट करते थे जैसे कोई अपने पास रखी बर्झी समर्पित कर डेटा था तो कोई फल या कोई फुल या कोई अपने पास रखी कोई भी चीज उस मृत शरीर व्यक्ति के पास रख देते थे उसी क्रम में अगर किसी के पास कुछ नही होता था तो अपना बाल ही अर्पित कर देते थे क्योकि सभ्यता और सामाजिक जीवन के शुरुवाती में इतने सुख सुविधा की चीजे नही थी जो वर्तमान में हमारे पास है इसलिए अपने से जो बन पड़ता था वह समर्पित करते थे धीरे धीरे समय के साथ साथ अर्पित करने की प्रथा बन गई व बाल समर्पित केवल उनके पुत्रो भाइयो या नजदीकी सम्बन्धी ही कर सकते है यह नियम कबीलों में लागू होता गया, यह नियम भी कई कबीलों में भिन्न भिन्न रूपों परिवर्तित होता गया और यही परम्परा आदिवासियों में भी विकसित हो गया की मृत्यु के पश्चात अपने पूर्वज(जिनकी मृत्यु हो गई है) उनको अंतिम सम्मान हेतु भेट स्वरुप अपना बाल समर्पित किया जाता है वर्तमान में भी यह नियम आदिवासी समुदाय में लागू है मै यह बात स्पष्ट करना चाहूँगा की यह परम्परा वैदिक युग के पहले से शुरू हुआ जो वैदिक युग में खूब खिला बड़ा व इसे वैदिक यूग में कई धर्मो में भिन्न भिन्न रूपों में वर्णन किया गया परन्तु यह किसी धर्म से सम्बंधित नही था, वर्तमान में भी इसके स्वरुप में कई भिन्नता परिलक्षित होती है जैसे बाल के साथ मुंच्छ भी बनाने की परम्परा विकसित हो गई, जिनका मृत्यु हुआ है उनका कोई बड़ा लड़का है वही अपने पिता को बाल दे सकता है. चोटी रखने की परम्परा , मठ बनाने की परम्परा, आदि वर्तमान में प्रचलित है ,, जैसा की लेख से ही पता चल गया होगा की मुंडन करने की परम्परा बहुत पुरानी है,,,,,,,वर्तमान में कई लोग इसको विभिन्न धर्मो के अंतर्गत देखते है जो की गलत है,,, कई बार कई परम्परा या लोक व्यवहार में समानता के चलते हम सभी चीजो को एक ही मान के चलते है जो की सही नही है आपका विचार मेरे विचार से मिले जरुरी नही है,,,,,अगर आप धार्मिक रूप से मुंडन करवाते होंगे शायद पूर्वज की आत्मा के शांति के लिए कह नही सकते
कबीर दास जी ने बहुत
अच्छी बात कही है:-
मुड़ी मुड़ाय ले हरी मिले त सब कोई ले मुड़ाय
बार बार के मुड़ते भेड़ बैकुंठ न जाय
आपको लेख कैसा लगा जरुर कमेंट करे
आपका अपना
आर्यन चिराम
9 Comments
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteआप अपना शुभ नाम लिखे सर
DeleteYe sab mujhe pahale malum nhi tha thank u ye jankari dene ke liye mai chahti hu ki aap isi trh ki jankari dete the🙏
DeleteKhirendri kashyap (khilli)
Deleteआपको किन किन बिंदुओं पर लेख चाहिए कमेंट कर सकते है
Deleteआपका लेख पढ़कर अच्छा लगा, आप निरंतर हमारे समाज की जानकारी हभ तक शेयर करते रहे |
ReplyDeleteआपका लेख पढ़कर अच्छा लगा, आप निरंतर हमारे समाज की जानकारी हभ तक शेयर करते रहे |
ReplyDeleteआपको किन किन बिंदुओं पर लेख चाहिए कमेंट कर सकते है
ReplyDeleteबहुत ही बढ़िया फोटो है ऐसे ही share करते रहियेगा|
ReplyDeleteअपना विचार रखने के लिए धन्यवाद ! जय हल्बा जय माँ दंतेश्वरी !