जय जोहार!
सभी
सम्माननीय पाठक गण, समाज के वरिष्ठजन, मातृशक्ति, युवा साथियों और मेरे प्यारे भाइयों-बहनों—आप सभी को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आज 9 अगस्त केवल शुभकामना देने का दिन नहीं है। यह दिन हमें अपने इतिहास को याद करने, वर्तमान को समझने और भविष्य के लिए अपनी दिशा तय करने का अवसर देता है।
संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को विश्व के आदिवासीयों/मूलनिवासीयों के संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दी। लेकिन हमारे लिए आदिवासी होना किसी एक दिन का विषय नहीं है। यह हमारी पहचान, संस्कृति, भाषा, प्रकृति से संबंध और पीढ़ियों से चले आ रहे सामुदायिक जीवन-दर्शन का हिस्सा है।
इतिहास हमें क्या बताता है?
भारत का आदिवासी इतिहास केवल जंगलों में रहने वाले समुदायों का इतिहास नहीं है। अपितु यह जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा स्वाभिमान के संघर्ष का इतिहास है।
औपनिवेशिक शासन के समय जब जंगलों और जमीन पर बाहरी नियंत्रण बढ़ा, तब अनेक आदिवासी योद्धाओं ने इसका खुलकर प्रतिरोध किया।
वीर गैंदसिह नायक, वीर नारायणसिंह, वीर गुंडाधुर, बिरसामुंडा, जैसे
अनेकों वीरो ने आंदोलन की अगुवाई की—
अनेकों वीरो ने आंदोलन की अगुवाई की—
ये केवल इतिहास के पन्ने मात्र नहीं हैं। ये हमें बताते हैं कि आदिवासी योद्धाओं और समुदायों ने अन्याय के सामने झुकना कभी स्वीकार नहीं किया।
बिरसा मुंडा ने केवल अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं किया था; उन्होंने अपने समाज को आत्मसम्मान, सामाजिक सुधार और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने का संदेश भी दिया।इसलिए हमें अपने नायकों को केवल मूर्तियों और जयंतियों तक सीमित नहीं करना चाहिए। उनके विचारों को अपने व्यवहार में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
संविधान ने हमें क्या दिया?
स्वतंत्र भारत में आदिवासी समाज के अधिकारों को संविधान ने विशेष संरक्षण दिया।
अनुच्छेद 46, अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित पाँचवीं और छठी अनुसूची, राजनीतिक
प्रतिनिधित्व और विशेष संवैधानिक प्रावधानों ने आदिवासी समाज की सुरक्षा और विकास के लिए आधार तैयार किया।
प्रतिनिधित्व और विशेष संवैधानिक प्रावधानों ने आदिवासी समाज की सुरक्षा और विकास के लिए आधार तैयार किया।
बाद में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम—PESA और वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे कानूनों ने ग्रामसभा, सामुदायिक वन अधिकार और पारंपरिक अधिकारों को कानूनी आधार देने की कोशिश की।
लेकिन हमें एक सवाल स्वयं से पूछना होगा??—
क्या कानून बन जाना ही अधिकार मिल जाने के बराबर है?
नहीं।
कानून किताब में लिखा होना अलग बात है और उसका गाँव की ग्रामसभा तक सही अर्थ में पहुँचना अलग बात है।
इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है—
अपने अधिकारों की जानकारी।
कानून की समझ।
ग्रामसभा की मजबूती।
और लोकतांत्रिक भागीदारी।
---
आज आदिवासी समाज के सामने चुनौतियाँ बदल गई हैं।
पहले लड़ाई सीधे जंगल और जमीन के लिए थी।
आज उसके साथ शिक्षा, रोजगार, विस्थापन, भाषा, संस्कृति, डिजिटल दुनिया, पर्यावरण और आर्थिक असमानता जैसे नए प्रश्न जुड़ गए हैं।
आज विकास जरूरी है। सड़क चाहिए, अस्पताल चाहिए, स्कूल चाहिए, इंटरनेट चाहिए, रोजगार चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि—
विकास किसका हो और किस कीमत पर हो?
अगर विकास के नाम पर किसी समुदाय की जमीन चली जाए, जंगल चला जाए, संस्कृति टूट जाए और विस्थापन के बाद रोजगार भी सुनिश्चित न हो—तो हमें विकास के मॉडल पर सवाल उठाने का अधिकार है।
हमें विकास का विरोध नहीं करना है।
“विकास चाहिए, लेकिन न्यायपूर्ण विकास चाहिए।”
“सड़क चाहिए, लेकिन हमारे गाँव की पहचान मिटाकर नहीं।”
“रोजगार चाहिए, लेकिन हमारी जमीन और संसाधनों से हमें बेदखल करके नहीं।”
---
जलवायु परिवर्तन के दौर में आदिवासी ज्ञान
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से चिंतित है।
लेकिन आदिवासी समाज की जीवन-पद्धति हमें सदियों से सिखाती रही है कि—
प्रकृति केवल संसाधन नहीं है; प्रकृति जीवन का आधार है।
हमारे पूर्वज जंगल से केवल लकड़ी लेने वाला संबंध नहीं रखते थे। जंगल उनके लिए भोजन, औषधि, संस्कृति, आजीविका और आस्था का आधार था।
आज दुनिया आधुनिक विज्ञान के माध्यम से जिस बात को समझने की कोशिश कर रही है, आदिवासी समाज ने उसे अपने जीवन में लंबे समय से जिया है—
जितना लो, उतना ही प्रकृति को लौटाओ।
इसलिए आदिवासी ज्ञान को पिछड़ेपन की निशानी समझना गलत है।
हमें आधुनिक शिक्षा और विज्ञान को अपनाना है, लेकिन अपने पारंपरिक ज्ञान को छोड़कर नहीं।
---
भाषा और संस्कृति का प्रश्न
आज हमारे सामने एक और गंभीर चुनौती है—हमारी भाषाओं का संरक्षण।
किसी भाषा का समाप्त होना केवल शब्दों का समाप्त होना नहीं है।
उसके साथ समाप्त होते हैं—
लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, पारंपरिक ज्ञान, इतिहास और एक पूरी पीढ़ी की स्मृतियाँ।
इसलिए हमें अपने बच्चों को केवल अंग्रेजी या हिंदी सिखाने की चिंता नहीं करनी चाहिए; हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपने घर की भाषा, अपने समाज का इतिहास और अपनी संस्कृति समझें।
अगर हमारी अगली पीढ़ी अपने पूर्वजों की भाषा बोलने में शर्म महसूस करने लगे, तो यह केवल भाषा की हार नहीं होगी—यह हमारी सामूहिक स्मृति की हार होगी।
---
विश्व आदिवासी दिवस केवल नृत्य, गीत और कार्यक्रम का दिन बनकर न रह जाए।
हम हर गाँव में कुछ छोटे लेकिन ठोस संकल्प ले सकते हैं।
पहला—शिक्षा।
हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और हमारे युवा उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीकी शिक्षा और डिजिटल कौशल में आगे बढ़ें।
दूसरा—अधिकारों की जानकारी।
PESA, वन अधिकार कानून, संविधान और ग्रामसभा की भूमिका को गाँव-गाँव समझाया जाए।
तीसरा—भाषा और संस्कृति।
हम अपनी मातृभाषा में गीत, कहानी, इतिहास और लोकज्ञान को लिखें, रिकॉर्ड करें और अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ।
चौथा—आर्थिक आत्मनिर्भरता।
केवल सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र रास्ता न मानें। कृषि, लघु वनोपज, हस्तशिल्प, पर्यटन, डिजिटल कार्य, छोटे व्यवसाय और कौशल आधारित रोजगार को बढ़ावा दें।
पाँचवाँ—महिलाओं और युवाओं की भागीदारी।
जिस समाज की आधी आबादी और युवा शक्ति निर्णय प्रक्रिया से दूर हो, वह समाज तेजी से आगे नहीं बढ़ सकता।
छठा—प्रकृति संरक्षण।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर वास्तविक कार्यों से हो।
---
आज के युवाओं से एक बात
मेरे युवा साथियों,
आज हमारे हाथ में मोबाइल है। इंटरनेट है। सोशल मीडिया है। दुनिया हमारे सामने खुली हुई है।
लेकिन एक सवाल है—
क्या दुनिया हमें जानती है, या हम केवल दुनिया को जान रहे हैं?
हमें अपनी कहानी स्वयं लिखनी होगी।
अपनी संस्कृति को आधुनिक तकनीक से जोड़ना होगा।
अपने लोकगीतों को डिजिटल माध्यम तक ले जाना होगा।
अपने इतिहास को दस्तावेज बनाना होगा।
अपने पारंपरिक ज्ञान को शोध का विषय बनाना होगा।
और अपने गाँव की समस्याओं के समाधान में तकनीक का उपयोग करना होगा।
हमें केवल यह नहीं कहना है कि—
“हम आदिवासी हैं।”
हमें दुनिया को दिखाना है कि—
“हमारी पहचान हमारी शक्ति है।”
---
अंत में...
आज विश्व आदिवासी दिवस पर हमें तीन चीजें साथ लेकर आगे बढ़ना है—
**इतिहास से स्वाभिमान,
संविधान से अधिकार,
और भविष्य के लिए शिक्षा एवं तकनीक।**
हम न तो अपने अतीत में कैद रह सकते हैं और न ही आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को खो सकते हैं।
हमें ऐसा समाज बनाना है जो—
अपनी संस्कृति पर गर्व करे,
संविधान को समझे,
प्रकृति का सम्मान करे,
शिक्षा को अपनाए,
तकनीक का उपयोग करे
और अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाए।
आइए, आज हम संकल्प लें—
हम अपनी भाषा बचाएँगे।
अपनी संस्कृति बचाएँगे।
अपने जंगल और पर्यावरण की रक्षा करेंगे।
अपने बच्चों को शिक्षित करेंगे।
अपने अधिकारों को समझेंगे।
और समाज को केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि शिक्षा, संगठन और संवैधानिक चेतना से मजबूत बनाएँगे।
क्योंकि—
**आदिवासी समाज केवल अतीत की विरासत नहीं है,
वह भारत के वर्तमान और भविष्य का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।**
जोहार!
जय प्रकृति!
जय संविधान!
जय आदिवासी समाज!
विश्व आदिवासी दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
आपका अपना आर्यन चिराम





0 टिप्पणियाँ
अपना विचार रखने के लिए धन्यवाद ! जय हल्बा जय माँ दंतेश्वरी !