दोस्तों नमस्कार इससे पहले हम लोगों ने बस्तर की पहला विद्रोह हल्बा विद्रोह के बारे में पढ़ा हल्बा विद्रोह बस्तर का ही नही अपितु पुरे छत्तीसगढ़ के प्रथम विद्रोह माना जाता है पहले भी पढ़े थे अगर और पढना चाहते हो तो पोस्ट के अंत में लिंक से पढ़ सकते है
हल्बा विद्रोह पिछले अध्याय में हमने पढ़ा था की किस प्रकार दरियाव देव ने धोखे से अजमेर सिंग की हत्या किया था व किस प्रकार हल्बा लोगों की नृशंस हत्याए किये थे
उसी में आगे आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए दरियाव देव के शासन काल में घटित एक और विद्रोह के बारे में पढेंगे जिसका नाम है भोपालपट्टनम विद्रोह यह विद्रोह होने के प्रमुख पहलुओ पर सरसरी नजर घुमाते हुए आगे की घटना क्रम में सम्मिलित होंगे जिन तथ्यों ने हल्बा विद्रोह को असफल किया उन्ही तथ्यों ने भोपालपट्टनम विद्रोह में सहायक सिद्द हुआ हल्बा विद्रोह के विफलता के प्रमुख कारक1. अजमेर सिंह द्वारा हल्बा सैनिकों को नजरअंदाज करना तथा भर्ती योजना ने सलाह न लेना2. कांकेर के राजा भी उनकी सैनिक भर्ती योजना से खुश नही थे व कहा सुनी होने पर अपने सेना हटा लिया
उसी में आगे आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए दरियाव देव के शासन काल में घटित एक और विद्रोह के बारे में पढेंगे जिसका नाम है भोपालपट्टनम विद्रोह यह विद्रोह होने के प्रमुख पहलुओ पर सरसरी नजर घुमाते हुए आगे की घटना क्रम में सम्मिलित होंगे जिन तथ्यों ने हल्बा विद्रोह को असफल किया उन्ही तथ्यों ने भोपालपट्टनम विद्रोह में सहायक सिद्द हुआ हल्बा विद्रोह के विफलता के प्रमुख कारक1. अजमेर सिंह द्वारा हल्बा सैनिकों को नजरअंदाज करना तथा भर्ती योजना ने सलाह न लेना2. कांकेर के राजा भी उनकी सैनिक भर्ती योजना से खुश नही थे व कहा सुनी होने पर अपने सेना हटा लिया
3. माडिया और मुरिया सैनिको की भर्ती जो बड़े डोंगर राजधानी के खिलाफ थे उनकी भर्ती
4. जब दरियाव देव से मिलने गया तो अपने सैनिक न ले जाकर सबसे बड़ी गलती किये
हल्बा विद्रोह को कुचलने में प्रमुख कारक व भोपालपट्टनम विद्रोह की चिंगारी
हल्बा विद्रोह को कुचलने में प्रमुख कारक व भोपालपट्टनम विद्रोह की चिंगारी
1. जैपुर के राजा द्वारा बहुत ही अधिक मात्रा में सैनिक सहायता दिया गया जो हल्बा सैनिको की संख्या से कांफी अधिक था
2.भोसला शासको से सहायता प्राप्त कर संधि अनुसार उन्हें टकोली कर देने के लिए मंजूर हुआ(शुक्ल 1988)
कि मराठा अपने सर्वोत्तम प्रयास के उपरान्त बस्तर को पराभूत नहीं कर सके तथा नीलू पंडित के नेतृत्ववाली मराठा-सेना को बस्तरसेना ने सन् 1750 ई. में टुकड़े-टुकड़े कर डाला था, किन्तु 1779 ई. में दलपतदेव के पत्र। तथा उत्तराधिकारी दरियावदेव को महान् ‘हल्बा क्रान्ति' के विरुद्ध मराठों से सहायता माँगनी। पड़ी और उसे नागपुर के भोंसला राजा को वार्षिक 4000 रुपये से 5000 रुपये तक की। अल्प राशि देने के लिए आबद्ध होना पड़ा। फिर भी उसने पूर्ण रूप से राजनैतिक समर्पण। नहीं किया।(ग्रिग्सन 1949, 10; इलियट, 1856: 32; ग्लसफडे 1862: 258)। उस समय बिंबाजी भोंसला (1758-1787) छत्तीसगढ़-संभाग का मराठा- राजा था। बिंबाजी रघुजी का पुत्र था। बिंबाजी ने विद्रोह को दबाने के लिए अपनी सेना बस्तर भेजी और इस प्रकार उसने बस्तर को एक अधीनस्थ राज्य बना लिया । 3. एक अन्य संभागीय अभिलेख (जिल्द 8, पत्र क्रमांक 17, पृष्ठ 36, दिनांक 4 अप्रैल 1856) से हमें यह पता चलता है कि जब
'काँकेर के राजा रहिपालदेव का स्वर्गवास हआ. तब उसके पश्चात उसका पुत्र धीरजसिंह सिंहासनासीन हुआ। उस समय बस्तर के राजा ने 'सिंहावा' नामक सालुक पर आक्रमण करके उसे छीन लिया था। बिंबाजी ने उसे वहाँ से खदेड़ देने के लिए कूच किया और इस कार्य में काँकेर के राजपुत्र ने उसकी इतनी अधिक • मदद की कि बिंबाजी ने काँकेर का धमतरी तालुका उसे वापस दिला दिया, किन्तु टाकोली की ।गशि को बढ़ाकर 18,000
रुपये कर दी। यह घटना एवं वर्णन स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं। कि काँकेर एक अधीनस्थ राज्य था और धमतरी-तालुक उसके प्रत्यक्ष नियंत्रण में था जो कि उसे पट्टे पर दिया गया था। बिम्बाजी के साथ संघर्ष करने वाले बस्तर- राजा को वहाँ से खदेड दिया गया था, किन्तु तब भी किसी को भी निर्णयात्मक विजय प्राप्त नहीं हो सकी। यहाँ हमें यह पता चल सकता है कि बस्तर के राजा ने सिंहावा-क्षेत्र पर (जो कि काँकरला के दखल में था) चढ़ाई क्यों की? हमें यह ज्ञात है कि हल्बा-क्रान्ति में काँकेर के राजा ने क्रान्तिकारी नेता की सहायता की थी तथा सम्भवतः दरियावदेव उसे पाठ पढाना चाहता था. किन्तु मराठा-शक्ति के हस्तक्षेप के कारण वह सफल नहीं हो सका। इससे यह भी पता चलता है कि बस्तर के राजाओं ने मराठा- राजाओं को कभी भी महल नहीं दिया। 4. चुकि जैपुर के राजा ने दरियावदेव की सहायता उसके बड़े भाई अजमेरसिंह की यह में पराजय के लिए की थी, इसलिये इस सहायता के उपलक्ष्य में उसे 1777 ई. में कतिपय शर्तों के अधीन रहते हुए कोटपाड़-क्षेत्र प्राप्त हुआ था। इस समय से लेकर भोपालदेव के राज्यकाल (1842-1853) तक बस्तर के राजा तथा उसके पड़ोसी जैपुर के बीच यूद्ध – जैसी
स्थिति बनी रही। कारण कि दोनों राज्यों के बीच के क्षेत्रों के कुछ भागों पर किसका आधिपत्य रहे, यह विरोध का प्रमुख मुद्दा था।
कि मराठा अपने सर्वोत्तम प्रयास के उपरान्त बस्तर को पराभूत नहीं कर सके तथा नीलू पंडित के नेतृत्ववाली मराठा-सेना को बस्तरसेना ने सन् 1750 ई. में टुकड़े-टुकड़े कर डाला था, किन्तु 1779 ई. में दलपतदेव के पत्र। तथा उत्तराधिकारी दरियावदेव को महान् ‘हल्बा क्रान्ति' के विरुद्ध मराठों से सहायता माँगनी। पड़ी और उसे नागपुर के भोंसला राजा को वार्षिक 4000 रुपये से 5000 रुपये तक की। अल्प राशि देने के लिए आबद्ध होना पड़ा। फिर भी उसने पूर्ण रूप से राजनैतिक समर्पण। नहीं किया।(ग्रिग्सन 1949, 10; इलियट, 1856: 32; ग्लसफडे 1862: 258)। उस समय बिंबाजी भोंसला (1758-1787) छत्तीसगढ़-संभाग का मराठा- राजा था। बिंबाजी रघुजी का पुत्र था। बिंबाजी ने विद्रोह को दबाने के लिए अपनी सेना बस्तर भेजी और इस प्रकार उसने बस्तर को एक अधीनस्थ राज्य बना लिया । 3. एक अन्य संभागीय अभिलेख (जिल्द 8, पत्र क्रमांक 17, पृष्ठ 36, दिनांक 4 अप्रैल 1856) से हमें यह पता चलता है कि जब
'काँकेर के राजा रहिपालदेव का स्वर्गवास हआ. तब उसके पश्चात उसका पुत्र धीरजसिंह सिंहासनासीन हुआ। उस समय बस्तर के राजा ने 'सिंहावा' नामक सालुक पर आक्रमण करके उसे छीन लिया था। बिंबाजी ने उसे वहाँ से खदेड़ देने के लिए कूच किया और इस कार्य में काँकेर के राजपुत्र ने उसकी इतनी अधिक • मदद की कि बिंबाजी ने काँकेर का धमतरी तालुका उसे वापस दिला दिया, किन्तु टाकोली की ।गशि को बढ़ाकर 18,000
रुपये कर दी। यह घटना एवं वर्णन स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं। कि काँकेर एक अधीनस्थ राज्य था और धमतरी-तालुक उसके प्रत्यक्ष नियंत्रण में था जो कि उसे पट्टे पर दिया गया था। बिम्बाजी के साथ संघर्ष करने वाले बस्तर- राजा को वहाँ से खदेड दिया गया था, किन्तु तब भी किसी को भी निर्णयात्मक विजय प्राप्त नहीं हो सकी। यहाँ हमें यह पता चल सकता है कि बस्तर के राजा ने सिंहावा-क्षेत्र पर (जो कि काँकरला के दखल में था) चढ़ाई क्यों की? हमें यह ज्ञात है कि हल्बा-क्रान्ति में काँकेर के राजा ने क्रान्तिकारी नेता की सहायता की थी तथा सम्भवतः दरियावदेव उसे पाठ पढाना चाहता था. किन्तु मराठा-शक्ति के हस्तक्षेप के कारण वह सफल नहीं हो सका। इससे यह भी पता चलता है कि बस्तर के राजाओं ने मराठा- राजाओं को कभी भी महल नहीं दिया। 4. चुकि जैपुर के राजा ने दरियावदेव की सहायता उसके बड़े भाई अजमेरसिंह की यह में पराजय के लिए की थी, इसलिये इस सहायता के उपलक्ष्य में उसे 1777 ई. में कतिपय शर्तों के अधीन रहते हुए कोटपाड़-क्षेत्र प्राप्त हुआ था। इस समय से लेकर भोपालदेव के राज्यकाल (1842-1853) तक बस्तर के राजा तथा उसके पड़ोसी जैपुर के बीच यूद्ध – जैसी
स्थिति बनी रही। कारण कि दोनों राज्यों के बीच के क्षेत्रों के कुछ भागों पर किसका आधिपत्य रहे, यह विरोध का प्रमुख मुद्दा था।
भोपालपट्टनम विद्रोह के प्रमुख कारण
उपरोक्त लेख से यह ज्ञात होता है की जैपुर के राजा भी दरियाव देव से कुछ परगना को लेना चाहता था जिसके चलते उनके बीच कई बार यूद्ध जैसी स्थिति निर्मित हो गई थी भोसला शासक भी उनसे नाराज थे क्योकि वे चौथ टकोली देने के लिए तैयार नही होते थे व 1779 की नरसंहार से आदिवासी भी उनसे कांफी नाराज थे, और कांकेर का राजा भी सिहावा क्षेत्र में दखल देने के चलते नाराज थे तो इन सब अपने अपने स्तर पर बस्तर को अपने अधिपत्य में लेने हेतु प्रयासरत्त थे उसी समय सर्वप्रथम अभिलिखित प्रयास बंगाल-शासक द्वारा इस बात की। संभावनाओं का पता लगाया जाय कि बस्तर में कम्पनी का राज्य स्थापित किया जा सकता है ? कैप्टेन ब्लंट ने यह काम किया था। कैप्टन ब्लंट (विल्स, नागपुर स्टेट इन एट्टीन्थ सेंचुरी, पृष्ठ 111-119) को कम्पनी के निर्देश पर तथा रघोजी की अनुमति से संभावनाओं का पता लगाने के लिए भेजा गया था। कैप्टन ब्लंट 18 जनवरी 1795 ई.को चुनारगढ़ (उत्तरप्रदेश) से रवाना हुआ।और कोरिया, मातिन, आदि जमींदारियों को पार करने के बाद वह रतनपुर, रायपुर तथा काँकेर की। खुली भूमि में आया। बस्तर में प्रवेश करने के उसके प्रयत्न से पूर्व उसे छत्तीसगढ़ के मराठा-गवर्नर इतुल पण्डित अर्थात् विठ्ठल दिनकर तथा कांकेर के राजा (1790-1796) द्वारा आगाह किया गया। था कि कांकेर से बस्तर तथा उसके आगे जैपुर तक जाना यदि उसे असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य होगा क्योंकि वह प्रदेश जंगली तथा पहाड़ी है और वहाँ के गोंड़ निवासी बहुत ही क्रूर हैं। काँकेर के राजा के अनुसार 'बस्तर का राजा दरियावदेव तथा उसका पुत्र पिरकिशनदेव शक्तिशाली किन्तु अत्याचारी हैं। उसके अधिकार में देश का व्यापक भाग अड़तालीस परगनों में विभक्त है। अपने पिता की मृत्यु के समय दरियावदेव के तीन भाई थे। उनमें से दो को कैद कर उसने उनकी आँखें निकाल ली थीं तथा वे दोनों भाई आज भी उसकी कैद में है।। तीसरा भाई किसी प्रकार बच कर नागपुर भाग गया था। अपनी प्रजा के प्रति भी उसके। अत्यधिक नृशंसतापूर्ण कार्य सुनने में आते हैं। उसका एक ही संबंधी बचा था, जो कि चापलूस होने के साथ-साथ उसके विचारों का अनुवर्तक था। उसने उसका भी अपहरण कर लिया था तथा भविष्य की भयावह परिस्थितियों से बचने के लिए वह भी भाग निकला।''दरियावदेव अपना निवास जगदलपुर से हटाकर पाँच कोस की दूरी पर स्थित एक पहाड़ी-दुर्ग केसलूर में ले गया था,उस समय इस राशि का भुगतान चार या पाँच वर्षों से रोक दिया गया था तथा मराठों ने उसके लिए बस्तर क्षेत्र पर कई बार हमला किया, तब कहीं वे बस्तर के राजा को केवल 5000 रुपए के भुगतान के लिए सहमत कर सके थे। मराठों ने कई गोंड़-जमींदारों। और बस्तर के पड़ोसी राज्यों को बस्तर को हथियाने के लिए सहमत कर लिया था। इस दृष्टि । से कि उनसे जितना अधिक क्षेत्र छीना जा सके. ले लिया जाए।
इन हमलों के दौरान कांकेर जगदलपुर तथा जैपुर- मार्ग से लगे कई ग्राम लूट लिये गये थे। यहाँ तक कि बंजारा-वाहकों तक ने जैपुर तक जाने वाले इस मार्ग को त्याग दिया था। दरअसल बस्तर से हमला करने वाली पार्टियाँ अक्सर मैदान में बसे लोगों को लूटने के लिए पहाड़ियों से नीचे उतरती थीं। अतएव कैप्टन ब्लंट ने पश्चिम की ओर ध्यान परिवर्तित किया और वर्तमान राजनांदगांव तथा चाँदा जिलों की जमींदारियों से होते हुए आगे बढ़ा, किन्तु अंत में अहीरी-जमींदारी से चाँदा जिले के दक्षिण-पूर्व में होते हुए इंद्रावती नदी को पार कर बस्तर की भोपालपट्टनम-जमींदारी में इंद्रावती और गोदावरी नदियों के संगम के ऊपरी बहाव की ओर कछ मीलों में प्रवेश करने का प्रयत्न किया। बस्तर के गोंडों ने उसके सैन्य दल पर निरंतर दबाव बनाए रखा तथा अनेक
आक्रमण किए। यद्यपि इन लोगों के धनुषबाण तथा कुल्हाड़ियाँ कैप्टन ब्लंट के आग्नेय अस्त्रों का मुकाबला नहीं कर सकती थी, फिर भी उसने (कैप्टन ब्लंट ने) बस्तर में प्रवेश करने के प्रयास को त्याग दिया। बाद में देवलमारी के मराठा- आमिल से उसे पता चला कि उसने ठीक ही समय पर वह प्रयास छोड़ दिया था; क्योंकि तब तक बस्तर के एक जमींदार से दूसरे जमींदार को यह संदेश भिजवाया जा चुका था कि वे उसकी (कैप्टन ब्लंट की) पार्टी को लूटने के लिए इकट्ठे हो जाएं। उस समय कैप्टन ब्लंट से चौबीस घण्टों तक लोहा लेने वाले अबुझमाड़िया, दण्डामी माडिया तथा कोया नामक आदिवासी थे। वे संभवतः उस समय गोदावरी-घाटी के विद्रोही दलों के द्वारा नियुक्त रणबांकुरे सदस्य थे या उनमें से कुछ दोर्ला
भी रहे होंगे। ये सभी बस्तर के उस भाग में गोंड जनजाति के रूप में जाने जाते थे। उन । पहाड़ियों और जंगलों से बचकर (जिनमें आमिल के सैंकड़ों लोग खो गये थे) निकल जाने पर ब्लंट को इस मराठा आमिल ने बधाई दी थी और जंगल के डन व्यक्तियों के बारे में टीका-टिप्पणी भी की थी, जिसके अनुसार खानाबदोश बंजारों के अतिरिक्त ये बस्तर में किसी को घुसने नहीं देते थे। बंजारा सभ्यता का प्रभाव लाने वाले प्रथम व्यक्तियों के रूप में सही। ढंग से निरूपित किए गए थे। उसकी टीका-टिप्पणियाँ कुछ सुधारों के साथ। अबुझमाड़-पहाड़ियों तथा मध्य बस्तर के जंगली क्षेत्रों के लिए निश्चित रूप से सही कही जा सकती थीं। उसके अनुसार बंजारे वे लोग थे जिन्होंने गोड लोगों से सलह करके उनको। आंशिक रूप से सभ्य बनाया था। यह उस आदान-प्रदान के कारण था,
जो विशेष रूप से ।नमक और गुड़ के रूप में किये जाते थे। इसके कारण उन मूलनिवासियों को विलासिता की वस्तुओं के स्वाद का पता चल गया था और वे अब आसानी से उन्हें छोड़ नहीं सकते थे। इन कारणों ने उन्हें अपने जंगलों की उपज, जैसे लाख, लोहा, लौहखनिज, और अन्य वस्तुएँ इकट्ठी करने के लिये प्रोत्साहित किया था। इन वस्तुओं के आधार पर वस्तुविनिमय होता। था. जिसके कारण इन बंजारों को संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की गई थी। यह आदान-प्रदान 1750 ई. से प्रारम्भ हआ। अब तक नमक तथा गुड़ की चाहत गोंड लोगों में काफी हद तक बढ़ गई थी और इस कारण वे धीरे-धीरे बाहरी सभ्यता से प्रभावित हो रहे थे। जब तक इन लोगों को इन वस्तुओं के स्वाद का पता नहीं था, तब तक कोई व्यक्ति उनसे सम्पर्क स्थापित करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। उसने अपनी टिप्पणी में यह भी
उल्लेख किया कि मराठा अपनी फौजी ताकत के आधार पर भी जो नहीं करा सकते थे, वही इन वस्तुओं के कारण उन्हें अधिक अनुशासित कर दिया था। ब्लट ने बस्तर के हालात जानने के प्रलोभन का संवरण न कर सका। बैरागढ (चाँदा जिले में) से भोपालपट्टनम (बस्तर-राज्य में प्रवेश करने का प्रयास) में प्रवेश के लक्ष्य से वह पुनः दक्षिण की ओर मुड गया था। किन्तु उसका पूरी ताकत से विरोध किया गया और उसे वापस लौटने पर मजबूर किया गया। संक्षेपमें ब्लट ने बस्तर के सीमा क्षेत्र का दौरा किया. किन्तु बस्तर के अंदर नहीं जा सका। उसे। कहीं भी शान्ति और उन्नति देखने को नहीं मिली। बस्तर मराठा-शासन पर अवलबित था.
किन्तु दोनों में परस्पर सदभाव और विश्वास नहीं था। बस्तर तब तक कोई चौथ नहीं देता था, जब तक कि सेना की सहायता से ऐसा करने के लिये उसे मजबूर न कर दिया जाता। यहा चौथ की पद्धति परस्पर आदान-प्रदान की नीति पर आधारित नहीं थी।ब्लण्ट के यात्राकाल तक बस्तर में परिस्थितियाँ अनिर्णीत थीं। उसे ऐसा बताया गया था कि बस्तर के राजा बिलकुल ही स्वतंत्र हैं तथा वहाँ के निवासी इतने अधिक उम्र हैं कि
अपने राजा की अनुमति के बिना ये किसी भी व्यक्ति को बस्तर की सीमा के अन्तर्गत आने नहीं देते। इतना ही नहीं, ऐसी अनेक घटनाएँ सुनने को मिलती हैं, जब किसी फकीर ने बस्तर में प्रवेश करना चाहा तो इन्होंने उसका वध कर दिया (Early European Travellers in Nagpur territories, 1930, 141)। कोई व्यक्ति यदि इनके राजा की अनुमति के बिना इनके क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसका वध होना निश्चित है।
आक्रमण किए। यद्यपि इन लोगों के धनुषबाण तथा कुल्हाड़ियाँ कैप्टन ब्लंट के आग्नेय अस्त्रों का मुकाबला नहीं कर सकती थी, फिर भी उसने (कैप्टन ब्लंट ने) बस्तर में प्रवेश करने के प्रयास को त्याग दिया। बाद में देवलमारी के मराठा- आमिल से उसे पता चला कि उसने ठीक ही समय पर वह प्रयास छोड़ दिया था; क्योंकि तब तक बस्तर के एक जमींदार से दूसरे जमींदार को यह संदेश भिजवाया जा चुका था कि वे उसकी (कैप्टन ब्लंट की) पार्टी को लूटने के लिए इकट्ठे हो जाएं। उस समय कैप्टन ब्लंट से चौबीस घण्टों तक लोहा लेने वाले अबुझमाड़िया, दण्डामी माडिया तथा कोया नामक आदिवासी थे। वे संभवतः उस समय गोदावरी-घाटी के विद्रोही दलों के द्वारा नियुक्त रणबांकुरे सदस्य थे या उनमें से कुछ दोर्ला
भी रहे होंगे। ये सभी बस्तर के उस भाग में गोंड जनजाति के रूप में जाने जाते थे। उन । पहाड़ियों और जंगलों से बचकर (जिनमें आमिल के सैंकड़ों लोग खो गये थे) निकल जाने पर ब्लंट को इस मराठा आमिल ने बधाई दी थी और जंगल के डन व्यक्तियों के बारे में टीका-टिप्पणी भी की थी, जिसके अनुसार खानाबदोश बंजारों के अतिरिक्त ये बस्तर में किसी को घुसने नहीं देते थे। बंजारा सभ्यता का प्रभाव लाने वाले प्रथम व्यक्तियों के रूप में सही। ढंग से निरूपित किए गए थे। उसकी टीका-टिप्पणियाँ कुछ सुधारों के साथ। अबुझमाड़-पहाड़ियों तथा मध्य बस्तर के जंगली क्षेत्रों के लिए निश्चित रूप से सही कही जा सकती थीं। उसके अनुसार बंजारे वे लोग थे जिन्होंने गोड लोगों से सलह करके उनको। आंशिक रूप से सभ्य बनाया था। यह उस आदान-प्रदान के कारण था,
जो विशेष रूप से ।नमक और गुड़ के रूप में किये जाते थे। इसके कारण उन मूलनिवासियों को विलासिता की वस्तुओं के स्वाद का पता चल गया था और वे अब आसानी से उन्हें छोड़ नहीं सकते थे। इन कारणों ने उन्हें अपने जंगलों की उपज, जैसे लाख, लोहा, लौहखनिज, और अन्य वस्तुएँ इकट्ठी करने के लिये प्रोत्साहित किया था। इन वस्तुओं के आधार पर वस्तुविनिमय होता। था. जिसके कारण इन बंजारों को संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की गई थी। यह आदान-प्रदान 1750 ई. से प्रारम्भ हआ। अब तक नमक तथा गुड़ की चाहत गोंड लोगों में काफी हद तक बढ़ गई थी और इस कारण वे धीरे-धीरे बाहरी सभ्यता से प्रभावित हो रहे थे। जब तक इन लोगों को इन वस्तुओं के स्वाद का पता नहीं था, तब तक कोई व्यक्ति उनसे सम्पर्क स्थापित करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। उसने अपनी टिप्पणी में यह भी
उल्लेख किया कि मराठा अपनी फौजी ताकत के आधार पर भी जो नहीं करा सकते थे, वही इन वस्तुओं के कारण उन्हें अधिक अनुशासित कर दिया था। ब्लट ने बस्तर के हालात जानने के प्रलोभन का संवरण न कर सका। बैरागढ (चाँदा जिले में) से भोपालपट्टनम (बस्तर-राज्य में प्रवेश करने का प्रयास) में प्रवेश के लक्ष्य से वह पुनः दक्षिण की ओर मुड गया था। किन्तु उसका पूरी ताकत से विरोध किया गया और उसे वापस लौटने पर मजबूर किया गया। संक्षेपमें ब्लट ने बस्तर के सीमा क्षेत्र का दौरा किया. किन्तु बस्तर के अंदर नहीं जा सका। उसे। कहीं भी शान्ति और उन्नति देखने को नहीं मिली। बस्तर मराठा-शासन पर अवलबित था.
किन्तु दोनों में परस्पर सदभाव और विश्वास नहीं था। बस्तर तब तक कोई चौथ नहीं देता था, जब तक कि सेना की सहायता से ऐसा करने के लिये उसे मजबूर न कर दिया जाता। यहा चौथ की पद्धति परस्पर आदान-प्रदान की नीति पर आधारित नहीं थी।ब्लण्ट के यात्राकाल तक बस्तर में परिस्थितियाँ अनिर्णीत थीं। उसे ऐसा बताया गया था कि बस्तर के राजा बिलकुल ही स्वतंत्र हैं तथा वहाँ के निवासी इतने अधिक उम्र हैं कि
अपने राजा की अनुमति के बिना ये किसी भी व्यक्ति को बस्तर की सीमा के अन्तर्गत आने नहीं देते। इतना ही नहीं, ऐसी अनेक घटनाएँ सुनने को मिलती हैं, जब किसी फकीर ने बस्तर में प्रवेश करना चाहा तो इन्होंने उसका वध कर दिया (Early European Travellers in Nagpur territories, 1930, 141)। कोई व्यक्ति यदि इनके राजा की अनुमति के बिना इनके क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसका वध होना निश्चित है।
असौहार्द्रपूर्ण इन क्षेत्रों की जनजातियों के बीच केवल एक ही जाति जाने का साहस
कर सकती है और वह है बंजारा। इन दुर्गम पहाड़ियों में बंजारे इनके लिए गुड तथा
नमक ले ।जाते हैं तथा बदले में आदिवासियों से वन्योपज प्राप्त करते हैं।'इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी में गोंड़ों के इस देश में कैप्टन ब्लण्ट नामक यूरोपीय । अधिकारी भी नहीं पहुंच पाया था, जो अपने साहस व कशाप्रबद्धि के कारण मराठा-शासित । लगभग प्रत्येक क्षेत्र में यात्रा कर चुका था। ब्लण्ट ने बस्तर के पार्श्ववर्ती उन क्षेत्रों की यात्रा की थी. जहाँ प्रतिपल यह भय बना रहता था कि कहीं उसके दल के सभी सदस्यों को काट न डाला जाए। इन गोंड़ों से उसकी अनेक बार मुठभेड़ हुई है। यहाँ एक संघर्षपूर्ण घटना के वर्णन से हमें तद्युगीन गोंड़ों की अनातिथ्यपूर्ण मनोवृत्ति का ज्ञान होता है-' ब्लण्ट ने यह दृढ़ निश्चय किया था कि(अप्रैल 1795 तक ) इन्द्रावती नदी को पार कर यथासम्भव भोपालपट्टनम पहुंचने का प्रयास करेंगे। तदनुसार ब्लण्ट ने उपाकाल में ही अपनी यात्रा आरम्भ कर दीया । उन्होंने कुछ बिजारियों (बंजारों) को उनकी अनिच्छा से पकड़ रखा था तथा वे अब मुक्ति की प्रार्थना कर रहे थे। ब्लण्ट उन्हें विश्वास दिलाया कि 'तुम लोगों को मुक्त कर दिया जाएगा। इस योजना के साथ बंजारा आगे। बढ़ा, किन्तु सटी हुई पहाड़ी से सौ गज भी आगे नहीं बढ़ पाया था कि उसने देखा
कि नाले में अत्यधिक मात्रा में आदिवासी लेटे हुए हैं। यह नाला उसी पहाड़ी से निकलता। था,जिसके पास ब्लण्ट व उनके नौकर और कुछ सिपाही खड़े थे। जैसे ही थोड़ा आगे बढ़े, तीस या चालीस की संख्या में
आदिवासी मशाल व धनुषबाण लिए हुए खड़े मिले. तथा उन्होंने एकाएक वार करदिया। ब्लण्ट व उनके नौकर और कुछ सिपाही वहीं रुक गए। उस समय ब्लण्ट के साथ दो सिपाही. तीन-चार नौकर व एक गश्ती । गाड़ी (पराम्बुलेटर) सहित लश्कर था। आदिवासियों ने अपने भाषा में पूछा-'क्या आप लोग मित्र के रूप में आए हैं। अथवा शत्रु के रूप में? ब्लण्ट बंजारों के माध्यम से यह उत्तर दिलवाया कि-'हम यात्री है।'
आपके मित्र है। हमारा सम्बन्ध यात्रीपथ के अतिरिक्त किसी से नहीं है।' इसके पश्चात् । 'टोम्स-टोम्स' की ध्वनि आई, जिससे यह जानकारी मिली कि अब गोंड एकत्र हो रहे हैं। ब्लण्ट ने अपने अनुचरों को आज्ञा दी कि पशुओं और उन पर लदे हए माल को वे यहाँ से हटा लें, जिससे गोंडों के आक्रमण के समय जानमाल की रक्षा कर सकें। किन्तु कुछ ही देर बाद आवाजें आना बंद हो गईं। यह सोचकर कि शत्रु अब इधर नहीं आ रहे हैं, सशस्त्र आराम करने के लिए लेट गए। किन्तु अर्द्धरात्रि के समय पुनः लोगों के पानी में चलने के पदचाप सुनाई दिए तथा ब्लण्ट ने अनुमान लगाया कि वे हमारी ओर ही आ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि लगभग एक मील की दूरी पर वे नदी पार कर रहे हैं तथा उनकी पगध्वनि से ऐसा भी आभास हुआ कि इस बार उनकी संख्या बहुत अधिक होगी। 'ब्लण्ट शीघ्र ही आदेश दिया-' आप लोग सभी प्रकाश गुल कर दे तथा किसी प्रकार की ध्वनि किए बिना निष्पन्द लेटे रहें ।'
घनान्धकार छाया हुआ था, जिससे न तो गोंडों को देख सकते थे और न वे ब्लण्ट व उनके सैनिक को देख सकते थे ।' ब्लण्ट अपने स्काउटों को उनकी गतिविधियों के निरीक्षण के लिए भेजा तथा उन्हें आदेश दिया कि 'यदि गोंड तुम्हारी ओर बढ़ें, तो तुम भाग आना।' गोंड एक घण्टे तक हमारी तलाश करते रहे और वापस लौट गए। इस प्रकार इस देश के लोगों के अमैत्रीपूर्ण व्यवहार के कारण ब्लण्ट ने यह निश्चय किया कि ऐसी स्थिति में भोपालपट्टनम के राजा के पास कोई दूत भेजना उचित न होगा;क्योंकि ऐसी सम्भावना कम थी कि दूत वापस भी लौट सकेगा। ऐसा सम्भव था कि दूत की
प्रतीक्षा में हम लोगों पर वे सामूहिक आक्रमण कर देते; क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि गोंड इस बात के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे कि वे हमें इन्द्रावती पार नहीं होने देंगे।''ऐसी स्थिति में यह निर्णय लिया गया कि जिस रास्ते से यहाँ तक आए थे. उसी रास्ते से वापस चला जाए।' अतएव निश्चित किया गया कि अपनी पार्टी के साथ वापस लौटा जाए। जब ब्लण्ट लौट रहे थे उस समय गोंड नाला से होकर जंगल की ओर बढ़े तथा ब्लण्ट ने देखा कि उनका एक दल पहाड़ी की चोटी पर खड़ा है। यह सौभाग्य था कि इसी अवसर पर ब्लण्ट का एक नायक चार सिपाहियों के साथ आ गया था। ब्लण्ट ने उन्हें बन्दूक भर कर रखने को कहा। सिपाहियों ने अपनी-अपनी बंदूकों को भरा ही होगा कि आदिवासी अंधाधुध तीर बरसाने लगे। इतना ही नहीं बाणों की वर्षा करते हुए वे ब्लण्ट व उनके सिपाहियों की ओर बढ़ते चले आ रहे थे। उन धनुर्धारियों के पीछे-पीछे भशालधारी धनुर्धर लोग भी थे। वे बीस गज की दूरी पर रहे होंगे,कि ब्लण्ट के पार्टी के लोगों ने आत्मरक्षार्थ गोलियां चलानी प्रारम्भ कर दी। इससे। आदिवासियों के दल के चार या पाँच लोग तुरंत ही धराशायी हो गए। बन्दूक की गोलियों ने उन्हें भयभीत कर दिया। तथा वे चीखते-चिल्लाते व घायलों को लादते हुए जंगलों की ओर भाग।
गए।" ब्लण्ट ने शेष साथियों के साथ तीव्रगति से भोपालपटनम की ओर बढ़ा; क्योंकि ब्लण्ट चाहता था कि रात्रि होने से पूर्व वहाँ पहुँच जाये। इन्द्रावती पहँचने तक के मार्ग में कोई उल्लेखनीय घटना
नहीं हुई। इन्द्रावती नदी को पार करने के लिए घाट खोजते रहे. किन्तु कोई घाट नहीं मिला । रात्रि हो गई थी,
जिससे नदी तट पर ही पडाव डाल देना पड़ा। इस अवसर पर ब्लण्ट बहुत निराश व दुःखित था; क्योंकि गोंड-राजा के क्षेत्र के अन्तर्गत भी नहीं पहुंच पाए थे व उसकी प्रजा ने उन पर शत्रुवत् व्यवहार किया था, ब्लण्ट यह देखा कि तीन-चार व्यक्ति मशाल लिए हुए नदी के दूसरे किनारे पर हमारी गतिविधियों का निरीक्षण कर रहे
हैं। उन्होंने ऐसी भाषा में चिल्लाना प्रारम्भ किया, जो ब्लण्ट के समझ में नही आई, किन्तु बंजारों को समझ आ गई उन्होंने ब्लण्ट को यह बताया कि वे कह रहे हैं कि “
जब तक आप लोग भोपालपट्टनम से पारपत्र नहीं प्राप्त कर लेते. आपको नदी नहीं पार करने दिया जाएगा।" इस सम्बन्ध में ब्लण्ट बंजारों के माध्यम से कहलवाया कि - "मराठा- शासन से हमें एक पारपत्र उपलब्ध है, तथा उसे कल प्रातः काल आपके राजा के पास निरीक्षण के लिए भेज देंगे। ”एक घण्टे के बाद पुन: उनकी पुकार सुनाई दी। वे कह रहे थे। कि आपको बस्तर में घुसने नहीं दिया जाएगा। अर्द्धरात्रि में पानी बरस गया जिससे ब्लण्ट के घोडे व बैल के पैर फिसलते थे,
किन्तु अरुणोदय होते ही ब्लण्ट चुप्पी साधकर वापस लौट आए (J.T. Blunt, Narrative from a Route from Chunarghur to Yertnagudum, Asiatic Researches, Vol.VII, pp.133-6)।
कर सकती है और वह है बंजारा। इन दुर्गम पहाड़ियों में बंजारे इनके लिए गुड तथा
नमक ले ।जाते हैं तथा बदले में आदिवासियों से वन्योपज प्राप्त करते हैं।'इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी में गोंड़ों के इस देश में कैप्टन ब्लण्ट नामक यूरोपीय । अधिकारी भी नहीं पहुंच पाया था, जो अपने साहस व कशाप्रबद्धि के कारण मराठा-शासित । लगभग प्रत्येक क्षेत्र में यात्रा कर चुका था। ब्लण्ट ने बस्तर के पार्श्ववर्ती उन क्षेत्रों की यात्रा की थी. जहाँ प्रतिपल यह भय बना रहता था कि कहीं उसके दल के सभी सदस्यों को काट न डाला जाए। इन गोंड़ों से उसकी अनेक बार मुठभेड़ हुई है। यहाँ एक संघर्षपूर्ण घटना के वर्णन से हमें तद्युगीन गोंड़ों की अनातिथ्यपूर्ण मनोवृत्ति का ज्ञान होता है-' ब्लण्ट ने यह दृढ़ निश्चय किया था कि(अप्रैल 1795 तक ) इन्द्रावती नदी को पार कर यथासम्भव भोपालपट्टनम पहुंचने का प्रयास करेंगे। तदनुसार ब्लण्ट ने उपाकाल में ही अपनी यात्रा आरम्भ कर दीया । उन्होंने कुछ बिजारियों (बंजारों) को उनकी अनिच्छा से पकड़ रखा था तथा वे अब मुक्ति की प्रार्थना कर रहे थे। ब्लण्ट उन्हें विश्वास दिलाया कि 'तुम लोगों को मुक्त कर दिया जाएगा। इस योजना के साथ बंजारा आगे। बढ़ा, किन्तु सटी हुई पहाड़ी से सौ गज भी आगे नहीं बढ़ पाया था कि उसने देखा
कि नाले में अत्यधिक मात्रा में आदिवासी लेटे हुए हैं। यह नाला उसी पहाड़ी से निकलता। था,जिसके पास ब्लण्ट व उनके नौकर और कुछ सिपाही खड़े थे। जैसे ही थोड़ा आगे बढ़े, तीस या चालीस की संख्या में
आदिवासी मशाल व धनुषबाण लिए हुए खड़े मिले. तथा उन्होंने एकाएक वार करदिया। ब्लण्ट व उनके नौकर और कुछ सिपाही वहीं रुक गए। उस समय ब्लण्ट के साथ दो सिपाही. तीन-चार नौकर व एक गश्ती । गाड़ी (पराम्बुलेटर) सहित लश्कर था। आदिवासियों ने अपने भाषा में पूछा-'क्या आप लोग मित्र के रूप में आए हैं। अथवा शत्रु के रूप में? ब्लण्ट बंजारों के माध्यम से यह उत्तर दिलवाया कि-'हम यात्री है।'
आपके मित्र है। हमारा सम्बन्ध यात्रीपथ के अतिरिक्त किसी से नहीं है।' इसके पश्चात् । 'टोम्स-टोम्स' की ध्वनि आई, जिससे यह जानकारी मिली कि अब गोंड एकत्र हो रहे हैं। ब्लण्ट ने अपने अनुचरों को आज्ञा दी कि पशुओं और उन पर लदे हए माल को वे यहाँ से हटा लें, जिससे गोंडों के आक्रमण के समय जानमाल की रक्षा कर सकें। किन्तु कुछ ही देर बाद आवाजें आना बंद हो गईं। यह सोचकर कि शत्रु अब इधर नहीं आ रहे हैं, सशस्त्र आराम करने के लिए लेट गए। किन्तु अर्द्धरात्रि के समय पुनः लोगों के पानी में चलने के पदचाप सुनाई दिए तथा ब्लण्ट ने अनुमान लगाया कि वे हमारी ओर ही आ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि लगभग एक मील की दूरी पर वे नदी पार कर रहे हैं तथा उनकी पगध्वनि से ऐसा भी आभास हुआ कि इस बार उनकी संख्या बहुत अधिक होगी। 'ब्लण्ट शीघ्र ही आदेश दिया-' आप लोग सभी प्रकाश गुल कर दे तथा किसी प्रकार की ध्वनि किए बिना निष्पन्द लेटे रहें ।'
घनान्धकार छाया हुआ था, जिससे न तो गोंडों को देख सकते थे और न वे ब्लण्ट व उनके सैनिक को देख सकते थे ।' ब्लण्ट अपने स्काउटों को उनकी गतिविधियों के निरीक्षण के लिए भेजा तथा उन्हें आदेश दिया कि 'यदि गोंड तुम्हारी ओर बढ़ें, तो तुम भाग आना।' गोंड एक घण्टे तक हमारी तलाश करते रहे और वापस लौट गए। इस प्रकार इस देश के लोगों के अमैत्रीपूर्ण व्यवहार के कारण ब्लण्ट ने यह निश्चय किया कि ऐसी स्थिति में भोपालपट्टनम के राजा के पास कोई दूत भेजना उचित न होगा;क्योंकि ऐसी सम्भावना कम थी कि दूत वापस भी लौट सकेगा। ऐसा सम्भव था कि दूत की
प्रतीक्षा में हम लोगों पर वे सामूहिक आक्रमण कर देते; क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि गोंड इस बात के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे कि वे हमें इन्द्रावती पार नहीं होने देंगे।''ऐसी स्थिति में यह निर्णय लिया गया कि जिस रास्ते से यहाँ तक आए थे. उसी रास्ते से वापस चला जाए।' अतएव निश्चित किया गया कि अपनी पार्टी के साथ वापस लौटा जाए। जब ब्लण्ट लौट रहे थे उस समय गोंड नाला से होकर जंगल की ओर बढ़े तथा ब्लण्ट ने देखा कि उनका एक दल पहाड़ी की चोटी पर खड़ा है। यह सौभाग्य था कि इसी अवसर पर ब्लण्ट का एक नायक चार सिपाहियों के साथ आ गया था। ब्लण्ट ने उन्हें बन्दूक भर कर रखने को कहा। सिपाहियों ने अपनी-अपनी बंदूकों को भरा ही होगा कि आदिवासी अंधाधुध तीर बरसाने लगे। इतना ही नहीं बाणों की वर्षा करते हुए वे ब्लण्ट व उनके सिपाहियों की ओर बढ़ते चले आ रहे थे। उन धनुर्धारियों के पीछे-पीछे भशालधारी धनुर्धर लोग भी थे। वे बीस गज की दूरी पर रहे होंगे,कि ब्लण्ट के पार्टी के लोगों ने आत्मरक्षार्थ गोलियां चलानी प्रारम्भ कर दी। इससे। आदिवासियों के दल के चार या पाँच लोग तुरंत ही धराशायी हो गए। बन्दूक की गोलियों ने उन्हें भयभीत कर दिया। तथा वे चीखते-चिल्लाते व घायलों को लादते हुए जंगलों की ओर भाग।
गए।" ब्लण्ट ने शेष साथियों के साथ तीव्रगति से भोपालपटनम की ओर बढ़ा; क्योंकि ब्लण्ट चाहता था कि रात्रि होने से पूर्व वहाँ पहुँच जाये। इन्द्रावती पहँचने तक के मार्ग में कोई उल्लेखनीय घटना
नहीं हुई। इन्द्रावती नदी को पार करने के लिए घाट खोजते रहे. किन्तु कोई घाट नहीं मिला । रात्रि हो गई थी,
जिससे नदी तट पर ही पडाव डाल देना पड़ा। इस अवसर पर ब्लण्ट बहुत निराश व दुःखित था; क्योंकि गोंड-राजा के क्षेत्र के अन्तर्गत भी नहीं पहुंच पाए थे व उसकी प्रजा ने उन पर शत्रुवत् व्यवहार किया था, ब्लण्ट यह देखा कि तीन-चार व्यक्ति मशाल लिए हुए नदी के दूसरे किनारे पर हमारी गतिविधियों का निरीक्षण कर रहे
हैं। उन्होंने ऐसी भाषा में चिल्लाना प्रारम्भ किया, जो ब्लण्ट के समझ में नही आई, किन्तु बंजारों को समझ आ गई उन्होंने ब्लण्ट को यह बताया कि वे कह रहे हैं कि “
जब तक आप लोग भोपालपट्टनम से पारपत्र नहीं प्राप्त कर लेते. आपको नदी नहीं पार करने दिया जाएगा।" इस सम्बन्ध में ब्लण्ट बंजारों के माध्यम से कहलवाया कि - "मराठा- शासन से हमें एक पारपत्र उपलब्ध है, तथा उसे कल प्रातः काल आपके राजा के पास निरीक्षण के लिए भेज देंगे। ”एक घण्टे के बाद पुन: उनकी पुकार सुनाई दी। वे कह रहे थे। कि आपको बस्तर में घुसने नहीं दिया जाएगा। अर्द्धरात्रि में पानी बरस गया जिससे ब्लण्ट के घोडे व बैल के पैर फिसलते थे,
किन्तु अरुणोदय होते ही ब्लण्ट चुप्पी साधकर वापस लौट आए (J.T. Blunt, Narrative from a Route from Chunarghur to Yertnagudum, Asiatic Researches, Vol.VII, pp.133-6)।
सन्दर्भ:-
बस्तर का मुक्ति संग्राम:-१७७४-१९१० डॉ शुक्ला (मध्य पदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी )
3. भोपलपटनम विद्रोह 1795-1800 ई.तक
4. परलकोट विद्रोह 1824-1825 ई.तक
5. तारापुर विद्रोह 1842-1854 ई.तक
6. मेरिया विद्रोह 1842-1863 ई.तक
7. लिंगागिरी विद्रोह 1854-1856 ई.तक
8. कोई विद्रोह 1857-1859 ई.तक
9. मुरिया विद्रोह 1876 ई.तक
10. रानी चो रिस 1878-1886 ई.तक
11 भुमकाल विद्रोह 1910 ई.तक

4. परलकोट विद्रोह 1824-1825 ई.तक

5. तारापुर विद्रोह 1842-1854 ई.तक

6. मेरिया विद्रोह 1842-1863 ई.तक

7. लिंगागिरी विद्रोह 1854-1856 ई.तक

8. कोई विद्रोह 1857-1859 ई.तक

9. मुरिया विद्रोह 1876 ई.तक

10. रानी चो रिस 1878-1886 ई.तक

11 भुमकाल विद्रोह 1910 ई.तक

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